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अंधेरे के रास्ते - भाग 10

अंधेरे के रास्ते - भाग 10 Writer: Lucky Thakur रवीना और सिमा का सफर जारी था। वे अब उस अंधेरे गुफा से बाहर आ चुकी थीं, जहां उन्होंने अपनी सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी थी। लेकिन यह यात्रा सिर्फ एक अदृश्य शक्ति से बचने तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि अब वे एक नए और अनजाने रास्ते पर चल रही थीं, जो उन्हें अपने भीतर की ताकत और जीवन के अर्थ से परिचित कराता। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान जो कुछ भी सीखा था, वह उन्हें अब अपने जीवन के अगले चरण में लागू करना था। अब उनका सामना न केवल बाहरी दुनिया से था, बल्कि अपनी अंदर की दुनिया से भी था। "सिमा, क्या तुम भी यह महसूस कर रही हो कि इस रास्ते पर हमें अकेला नहीं छोड़ा गया है?" रवीना ने सिमा से पूछा, जो कुछ दूर चलने के बाद रुक गई थी और चारों ओर की चुप्पी में खो गई थी। "हाँ, रवीना," सिमा ने सिर झुका लिया, "मुझे भी ऐसा ही लगता है। ऐसा लगता है जैसे कोई हमारी निगरानी कर रहा है। और यह डरावना नहीं, बल्कि कुछ ऐसा है जो हमें बताना चाहता है कि हमारी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है।" सिमा की बातों ने रवीना को चौंका दिया, क्योंकि ठीक उसी समय उसने भी मह...

सन्नाटे के बीच

 सन्नाटे के बीच

लेखक: लकी ठाकुर



उस छोटे से गाँव में हर किसी को यह पता था कि रात को हवेली के पास जाना मना था। हवेली के बारे में बहुत सी अफवाहें थीं। कुछ कहते थे कि वहाँ एक भूतिया शक्ति बसी हुई है, जबकि कुछ का मानना था कि वह जगह किसी अतीत के खौ़फनाक घटनाओं से जुड़ी है। लेकिन उस हवेली की ओर जो एक बार भी कदम बढ़ा चुका, वह फिर कभी लौट कर नहीं आया।

मेरे नाम राहुल है और मैं उस गाँव में हाल ही में आया था। मैं एक बड़े शहर से यहाँ आया था, जहाँ भीड़-भाड़ और व्यस्त जीवन ने मुझे हमेशा थका दिया था। यहाँ का शांत वातावरण मुझे अपनी ओर खींच रहा था। लेकिन हवेली, वह मुझे कुछ अलग ही आकर्षण दे रही थी। लोगों की कहानियों ने मेरी जिज्ञासा को और बढ़ा दिया था। मैंने ठान लिया था कि एक दिन मुझे उस हवेली में जाकर देखना ही होगा।

एक शाम, जब सूर्यास्त के बाद आसमान में हल्का अंधेरा छाने लगा, मैंने अपनी योजना बनाई और हवेली की ओर चल पड़ा। रास्ते में कुछ लोग मुझे रोकते और घबराकर कहते, "वहाँ मत जाओ।" लेकिन मुझे तो जैसे इस रहस्य को जानने का ख्वाब था, और मुझे पूरा विश्वास था कि यह सिर्फ अफवाहें होंगी।

जैसे ही मैंने हवेली का दरवाजा खोला, एक सर्द हवा का झोंका आया। हवेली के अंदर की भीतरी दीवारों पर उकेरे गए पुराने चित्रों और धुंधले शब्दों ने उस जगह को और भी रहस्यमय बना दिया था। दीवारों में एक विचित्र सी गूंज थी। कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे मैं किसी और दुनिया में आ गया हूं, एक ऐसी दुनिया जहां समय का कोई मतलब नहीं था।

मैं आगे बढ़ा और देखा कि कमरे में एक पुरानी लकड़ी की मेज पड़ी थी। उस मेज के ऊपर एक कटा हुआ कागज पड़ा हुआ था। मैंने उसे खोला और उसमें लिखा था, "अगर तुम सच्चाई जानना चाहते हो, तो तुम्हें अपने अतीत से निपटना होगा।"

यह पढ़ते ही मेरी धड़कन तेज़ हो गई। "अतीत? मेरा अतीत?" मुझे समझ में नहीं आया। फिर अचानक मेरे दिमाग में एक सवाल आया, "क्या यह हवेली मुझे पहले से जानती है?"

मेरे भीतर एक घबराहट थी, लेकिन उत्सुकता ने मुझे और आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया। मैंने कागज को फेंका और हवेली के अगले कमरे की ओर बढ़ा। वहां का दृश्य और भी विचित्र था। कमरे के बीच में एक पुराना ट्रंक रखा हुआ था, जिसमें से हल्की सी चमक आ रही थी।

मैंने धीरे-धीरे ट्रंक का ढक्कन खोला। अंदर एक फोटो था, और वह फोटो मुझे एक अजनबी के साथ खड़ा हुआ दिखा रहा था। अजनबी की आँखों में एक अजीब सी घबराहट थी। मैंने उसे ध्यान से देखा, और मुझे लगा कि वह अजनबी किसी जमाने में मेरा मित्र हो सकता था। पर मेरा ध्यान अचानक उस तस्वीर के नीचे लिखे शब्दों पर गया। "तुम उसे याद करोगे, राहुल।"

यह शब्द पढ़ते ही मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। मैंने ट्रंक के अंदर और कुछ खोजना शुरू किया। वहां एक पुरानी डायरी भी पाई, जिसमें मेरी ही लिखाई हुई कुछ बातें थीं। यह देख मुझे और भी घबराहट हो रही थी। "यह तो मेरी डायरी है! यह यहाँ कैसे आई?"

मैंने डायरी खोली और उसमें से एक पन्ना पलटा। उस पन्ने में लिखा था, "राहुल, तुम एक भूलभुलैया में फंस चुके हो। तुम्हारी यादें तुम्हें तुम्हारे अतीत से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। वह चीज़ जो तुमने कभी भूल दी थी, वह अब तुम्हारे सामने है।"

मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह क्या हो रहा था। क्या यह सब सच था? क्या मेरी जिंदगी में कुछ ऐसा था जिसे मैं भूल चुका था और अब वह मुझे यहाँ खींच लाया था?

रात के अंधेरे में वह आवाज़ फिर सुनाई दी, "राहुल, तुम्हारी असल यात्रा अब शुरू होती है।"

यह आवाज़ मुझे और भी डराने लगी थी। मैंने बिना समय गंवाए हवेली छोड़ने की सोची, लेकिन जैसे ही मैं दरवाजे तक पहुँचा, दरवाजा अपने आप बंद हो गया। अब मैं trapped था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए। फिर अचानक मेरी नजरें अंधेरे में एक पुराने आईने पर पड़ीं। जब मैंने आईने में देखा, तो मैं खुद को पहचान नहीं सका। मेरा चेहरा, मेरा शरीर—कुछ भी तो वही नहीं था जो पहले था।

मैं आईने के पास गया और झटके से देखा, लेकिन मेरी छाया अब मुझसे अलग हो चुकी थी। अचानक आईने में से एक और छाया बाहर आई। वो छाया वही अजनबी थी जो फोटो में था। वह धीरे-धीरे मेरे पास आने लगा। मैंने डरते हुए पूछा, "तुम कौन हो? यह सब क्या है?"

उस अजनबी की आँखों में एक गहरी रहस्यमय चमक थी, उसने कहा, "तुमने कभी नहीं समझा कि तुम्हारी यादें ही तुम्हारे जीवन के सबसे बड़े राज़ हैं। अब तुम अपने अतीत को जान पाओगे।"

यह सुनते ही वह अजनबी गायब हो गया, और मैं फिर से अकेला रह गया। मेरे मन में अजीब सी उलझन थी। क्या वह सब सच था? क्या वह अजनबी मेरा अतीत था? और मैं क्यों इस हवेली में फंसा हुआ था?

अब मुझे बस एक ही सवाल था—क्या मैं इस रहस्य को सुलझा पाऊँगा, या फिर यह राज़ मेरे साथ ही रह जाएगा?

कहानी अब और जटिल हो चुकी थी। क्या राहुल अपने अतीत को याद कर पाएगा? क्या वह हवेली के रहस्य को सुलझा पाएगा? ये सवाल अभी भी अधूरे थे।

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